इंतेज़ार

मलिक समरीन, सुलतानपुरी

हर पल कुछ ख़ास था,
क्या ख़ास वह अंदाज़ था ,
दिल की गहराइयों से, जब हमको नाज़ था,
दिल में उमंगें थीं, बहती तरंगें थीं,
लेकिन अब ये क्या हो गया,
क्यों जिस पर नाज़ था, वह वीरान हो गया,
क्या कहती है ये सियासत मुल्क की आवाम से,
क्यों आपसी झगड़े से मुल्क बदनाम हो गया,
कुछ ख़ास अगर नहीं था तो कुछ कम भी नहीं था,
कि जिस पर नाज़ न कर सकें, ऐसे हालात भी नहीं थे,
कुछ हो जाए वो जिसका हमको है इंतेज़ार,
ऐसी बन जाए वो लड़ी,
जिससे सबको हो प्यार,
बस इतना है इंतेज़ार,
बस इतना है इंतेज़ार !!

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