दौर फिर आयेगा

फ़ीरोज़” सुलतानपुरी

“क्यों हवादिस के मुख़ालिफ़ नहीं चलते हो यार,  
ढूंढ लो और जहाँ, बढ़ के समंदर उस पार,
किसने देखे हैं किताबों में लिखे लाल-ओ-गोहर,
हैं जहन्नुम भी यहीं पर, यहीं जन्नत की बहार,
छोड़िए उनको, जिन्हें ज़िद है, रहे उनका वुजूद,
सिर्फ़ बातों से नहीं मिलता ज़माने को क़रार ,
जो लकीरें मेरे बचपन में बहुत धुंधली थीं,
वो जवानी में मेरी, बन के उठीं तल्ख़ दरार,
वो भी इक दौर था जब दोस्त थीं माला, तस्बी,
ये भी इक दौर है जब आप से हम हैं बेज़ार,
भूली बिसरी हैं वो यादें कि अली और किशन,
हक़ बचाने के लिए मचल जाते थे दीवानावार,
फिर उठेगी उसी गुलशन से वफ़ा की ख़ुशबू,
फिर से वीरान बगीचे भी बनेंगे गुलज़ार”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *