हौसला

फ़ीरोज़ हसन सुलतानपुरी

बेअसर होगी अगर बात पुरानी लिख दूँ,
यानी टूटे हुए महलों की निशानी लिख दूँ,

कट गए पर तो चलो पैर के पंजों से सही,
अपनी परवाज़ के खोने की कहानी लिख दूँ,

उनको एहसास-ए-हक़ीक़त नहीं छूकर गुज़रा,
मुझसे उम्मीद कि पानी पे ही पानी लिख दूँ,

मेरे हिस्से में हैं मुरझाए हुए फूल तो क्या,
आओ उन फूलों को ही रात की रानी लिख दूँ,

एक झोंका भी बदल देता है सूरत जिनकी,
बादलों पर क्यों “फ़ीरोज़” अपनी कहानी लिख दूँ”  

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