प्रेरणा

मलिक समरीन, सुल्तानपुर

ये राह मंज़िल तक जाती हो,
तो ये बाधा कैसी

अगर इसे पार करना है,
तो मन में निराशा कैसी,

बिगुल बज चुका है,
अब तुम तैयार हो जाओ,

लहरों को चीरते हुए,
तुम पतवार बन जाओ,

ये कैसी लालसा है,
जो तेरे भीतर ही रहती है,

कभी तो मोम को आग से पिघलाओ,
उठो, दौड़ो और आगे बढ़ जाओ,

छोड़ो पीछे देखना, जीत का
तुम सार बन जाओ

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