बहार शहर में !!

फ़ीरोज़ हसन सुलतानपुरी

लरज़ती, सहमी हवाओं की बेबसी लेकर,
बहार शहर में आई है, तीरगी लेकर,

तमाम फूल मसर्रत के रख के चौखट पर,
तेरे दयार से लौटा हूँ, बेकली लेकर,

मुझे खुलूस की रिश्वत न देना ऐ दुनिया,
मैं पल गया हूँ ज़माने की बेरुख़ी लेकर,

वो दौर भूल जा, अब तो खुले समंदर में,
हुजूम औरतों का है रवां, कश्ती लेकर

मेरी हयात में ज़िल्लत के ज़ामिनो कल तुम,
निकल न पड़ना, मेरे नाम की तख्ती लेकर,

कि खामशी का ज़माना नहीं है, लब खोलो,
या एहतेजाज फ़क़त मोम की बत्ती लेकर,

ये बेखुदी भी फ़ना होगी, तुम उठो तो सही,
उनींदी आँखों में सूरज से रौशनी लेकर

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