तमाशबीन

फ़ीरोज़ हसन, सुल्तानपुरी

“बदल रही है हवा, कुछ तुम्हें खयाल भी है,
बुझा बुझा सा माहताब का जमाल भी है,
वो बाख़बर हैं कि तक़सीम हो चुकी मंज़िल,
जो लोग ज़ेर-ए-सफ़र हैं, वो ख़ुश ख़याल भी हैं,
हर इक शहर में हुकूमत बुलंद है लेकिन,
हर इक शहर में बुरा बेटियों का हाल भी है,
लिखे गए हैं तराने भी ख़ून-ए-इंसाँ से,
ये मेरे शहर में तहज़ीब की मिसाल भी है,
जो लोग बेटी बचाने के गीत गाते है,
उन्हीं पे बेटियों के ख़ून के सवाल भी हैं,
तमाशबीनों को फ़ुर्सत कहाँ कि सोच सकें,
तड़पती चीख़ों में उनके ही नौनिहाल भी हैं,
ये शर्त है कि खुली आँख से न कुछ देखूँ,
जुबां खुली तो मेरे पेट का सवाल भी है,
दिलों के ज़ख्म को क्या खूब शिफ़ा देती है,
यही है धर्म की तलवार, यही ढाल भी है”

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