दूर की परवाज़

फ़ीरोज़ हसन, सुल्तानपुरी

“जो ऊंची, दूर की परवाज़ के पर रखते हैं,
वो लोग वक़्त बदलने का हुनर रखते हैं,
            उन्हीं के हाथ है शोहरत, उरूज़ का गहना,
            जो वलवलों से निकलने का हुनर रखते हैं,
वो अपने गिर्द उजाले की चमक में खोकर,
मुग़ालते में हैं कि शम्स-ओ-क़मर रखते हैं,
            बहुत सम्हाल के रक्खो क़दम सियासत में,
            यहाँ बहर भी सवालों के भंवर रखते हैं,
बुझे चराग़ भी मुझको मेरी मंज़िल देंगे,
मैं जानता हूँ ये जलने का हुनर रखते हैं,
            चलो समेत लें टूटे हुये ख्वाबों का शहर
            ये लोग अपने हैं, ग़ैरों सा असर रखते हैं,
ज़ुहे नसीब कि दुनिया की नब्ज़ भाँप सका,
वगरना लोग यहाँ किस की खबर रखते हैं”

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