ज़िंदगी की जिल्द

फ़ीरोज़ हसन, सुल्तानपुरी

“ज़ख्म-ए-गुरबत से नज़र जकड़ी हुई है,
हौसलों की राह, पर पकड़ी हुई है,
थाम ही लेंगे सभी पन्ने बिलाखिर ,
ज़िंदगी की जिल्द गर उखड़ी हुई है,
बोझ वादों का रखा है सर पे लेकिन,
सांस की दुनिया, लगा, उखड़ी हुई है,
टूटता तारा भला क्या ख़ाक देगा,
डोर जिसकी खुद से ही उखड़ी हुई है,
मेरी ज़िद, साहिल पे ही आबाद हूंगा,
गरचे नीयत मौजों की बिगड़ी हुई है,  
मेरे फ़ाक़े, मेरी ज़ीनत मेरा परचम,
क्या हुआ दीवार गर उखड़ी हुई है,
उनकी फ़ितरत गुल के बदले संग देगी ,
 बस,बज़ाहिर फूल से जकड़ी हुई है”

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