नाम की तख़्ती

फ़ीरोज हसन, सुलतानपुरी

“इश्क़ के गुलशन में जब वहशत पुकारी जाएगी,
सबसे आगे दौड़ कर, शोहरत तुम्हारी जाएगी,
            आज बेशक गाड़ियों के काफ़िले पर रश्क, कल,
            दूसरे काँधों पे चढ़ कर, ये सवारी जाएगी,
साफ़गोई, हक़पसंदी, बेबसी के जुर्म में,
मेरे घर से नाम की तख़्ती उतारी जाएगी,
            जम गए जज़्बात तो समझो कि इंसाँ मर गया,
            ज़िंदगी तो सुर्ख़-रू की ही सँवारी जाएगी,
बंद आँखों से पढ़ा जो फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी,
उसको लफ़्ज़ों में कहूँ तो, उम्र सारी जाएगी,
            आपने हंस कर मेरे हालात पर अच्छा किया,
            अब तो इज्ज़त आप की बेशक निखारी जाएगी,
आज के इस बदनुमा हालात की तारीख़ भी,
झूठ के अवराक़ से होकर गुज़ारी जाएगी”

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