दामन को ही निचोड़ दिया

फ़ीरोज हसन, सुल्तानपुरी

“अहद अहद है, ये शीशा नहीं के तोड़ दिया,
कोई खिलौना नहीं जो बना के तोड़ दिया,
            कड़ी तपिश में मुझे कौन आसरा देता,
            सहारा जान के दामन को ही निचोड़ दिया,
निकल पड़े थे मेरे पैर, छोटी चादर से,
हवाओं ने मेरी ग़ैरत को ही सिकोड़ दिया,
            लिखो ख़ुद ही का मुक़द्दर, तो कोई बात बने,
            जहां मुक़ाम मिला, रास्ते को मोड दिया,
हमीं हों सबके मुताबिक़, ये ज़रूरी तो नहीं,
किसी ने साथ लिया, या किसी ने छोड़ दिया,
            वो आस्तीन के साँपों का रहनुमा निकला,
            गुनाह दूसरे का, मेरे सिर पे फोड़ दिया,
लरज़ती लौ को भटकने का खौफ़ भी न रहा,
चराग़ जब से हवाओं के आगे छोड़ दिया”

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