दिल की उलझन

फ़ीरोज़ हसन

“दिल की उलझन को किताबों में छुपाएँ कैसे,
ग़म का एहसास ज़माने को कराएं कैसे,
            बात वो, जिसका तसव्वुर भी हमें तड़पा दे,
            अपने माज़ी को भला हाल में लाएँ कैसे,
रोज़ मरते हैं कि जीने का हुनर सीख सकें,
रोज़ जीने का भला ख़्वाब सजाएं कैसे,
            उनके लफ़्ज़ों से टपकती है मिलावट की झलक,
            रहनुमाओं से भला हाथ मिलाएँ कैसे,
जिसको हासिल हो हवादिस से निकलने का हुनर,
उनकी शम्मा को हवाएँ भी बुझाएँ कैसे,
            जिसको पाने की ललक है, न गँवाने का मलाल,
            आंधियाँ उसको जमाने से हिलाएँ कैसे,
दौर तहज़ीब का पलटेगा मगर ऐ फ़ीरोज
आज दशनाम को ओढ़ें या बिछाएँ कैसे

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