रोते रोते मुस्कुराना !!

फ़ीरोज़ हसन सुलतानपुरी

“क़ैद  में भी गीत गाना आ गया है,
रोते रोते मुसकुराना आ गया है,
                        मंदिर-ओ-मस्जिद का चर्चा, लग रहा है,
                        फिर चुनावों का ज़माना आ गया है,
ठोकरें खा कर, तजुर्बा पीते पीते,
ज़िंदगी को आज़माना  आ गया है,
अब अगर वो याद भी आएँ  तो क्या है,
अब हमें ख़ुद को भुलाना आ गया है,
चाँद तारे तोड़ लाएँ, हुक्म कीजे,
मख़मली बातें बनाना आ गया है,
जिनको उंगली थाम कर चलना सिखाया,
अब उन्हें आँखें दिखाना आ गया है,
जिसका लहजा साफ़ लेकिन तल्ख़ भी है,
क्या कोई शायर सयाना आ गया है,
ग़म नहीं साया भी गरचे छोड़ जाए,
रास्ता, मंज़िल बनाना आ गया है”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *