वतन की ख़ाक

फ़ीरोज़ हसन

“ख्याल-ए-नाज़-ओ-अदा छोड़कर कहाँ जाएँ,
तेरी मिसाल-ए-जफ़ा छोड़कर कहाँ जाएँ,
            वो एहतेराम भी करते हैं मिरा ख़न्जर से,
            ये पुरखुलूस अदा छोड़कर कहाँ जाएँ,
वतन की ख़ाक मेरा आख़िरी मुक़ाम भी है,
वतन की ख़ाक भला छोड़कर कहाँ जाएँ,
            किसी का फ़ेल था माज़ी में, आज तक यारों,
            भुगत रहे हैं सज़ा, छोड़कर कहाँ जाएँ,
है आईने की भी ख़्वाहिश, पर आईने से है डर,
ये कश्मकश का सफ़र छोड़कर कहाँ जाएँ,
            भुला भी दें तेरे हुस्न-ओ-जमाल का चर्चा,
            ग़म-ए-हयात मगर छोड़कर कहाँ जाएँ”

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